हम लोग अपने माँ-बाप को दैवीय रूप दे देते है, ये कितना सही?

माँ-बाप को दैवीय रूप देने में यही प्रॉब्लम है कि जब वो आपके प्रति कुछ ग़लत कर रहे होते हैं, तो भी आप उनका विरोध नहीं कर पाते हो! बस इमोशनली ब्लैकमेल होते हो! और फिर अपने लिए ग़लत निर्णय ले लेते हो!

भारतीय उपमहाद्वीप की ये बहुत बड़ी प्रॉब्लम है कि वो इस रोमांटिसिज्म में जीते हैं कि ‘माँ-बाप अपने बच्चों के लिए बुरा कभी सोच ही नहीं सकते’! यही घुट्टी बचपन से इतनी पिलायी जाती है आपको कि आपके माँ-बाप में जातिवाद भरा हो या धार्मिक कट्टरपन, आपको दिखाई नहीं देता! हमारे यहाँ सवाल करने को ज़बान लड़ाना कहकर दबा दिया जाता है!

माँ-बाप इसी समाज से होते हैं इसलिए उनके अंदर समाज में फ़ैली सारी बुराइयाँ हो सकती हैं! वो आपके प्रेम विवाह, अंतर-जातीय विवाह, अंतर-धार्मिक विवाह के खिलाफ़ हो सकते हैं! ऐसा अक्सर देखा जाता है! वो आपकी शादी में दहेज़ के पूर्ण समर्थक हो सकते हैं! आपके लिए बुरा सोच सकते हैं! उनकी मर्ज़ी के खिलाफ़ जाकर शादी की तो घर से बेदख़ल करने से लेकर ऑनर किलिंग तक का रास्ता अख्तियार कर सकते हैं! क्या ये सब बातें आप सबसे छिपी हुयी हैं?

कई बार माँ-बाप जान बूझकर आपके साथ ग़लत करते हैं! तो कई बार समाज-जाति-बिरादर-धर्म और ‘चार लोगों’ के दबाव में करते हैं! प्रायः वो अपने बच्चों के बारे में भला ही सोचते हैं लेकिन जातिवाद, धार्मिक कट्टरता, अंधविश्वास, कर्मकाण्डों से ग्रस्त माँ-बाप की आपके बारे में ‘भली’ सोच कितनी भली हो सकती है? ख़ुद सोचो! उनके आपके बारे में ‘भले’ की परिभाषा ही ग़लत हो तो? सच तो ये है कि इस समाज में अधिकांश माँ-बाप अच्छी पेरेंटिंग तक नहीं जानते! अधिकांश माँ-बाप बच्चों को या तो लायबिलिटी (ख़ासकर बेटियों को) समझकर पालते हैं अथवा asset (ख़ासकर बेटों को) समझकर!

माँ-बाप एक इन्सान ही हैं! वो आपके द्वार उठाये गये अच्छे क़दम से भी जेन्युइनली दुखी भी हो सकते हैं! इसमें आपकी कोई ग़लती नहीं! मैं तो कई माँ-बाप को जानता हूँ जो अपने बेटे द्वारा दहेज़ मना करने के कारण भी दुखी हो गये! अधिकांश माँ-बाप इंटर-कास्ट, इंटर-रिलीजियस छोड़ो, आपकी अपनी जाति में भी आप शादी करो तो भी दुखी हो जाते हैं कि तुमने इतना बड़ा निर्णय ख़ुद से, उनसे बिना पूछे कैसे ले लिया! भले ही आप 30 साल के हो या कितनी भी ऊँची पढ़ाई कर रखी हो!

किसी भी रिश्ते हो दैवीय रूप देने में यही समस्या है! यही सीख स्टूडेंट्स को अपने टीचर से सवाल पूछने से रोकती है, किसी बड़े-बुजुर्ग के ग़लत होने पर भी चुप रहने का दबाव बनाती है, किसी रिश्तेदार या किसी अभिभावक के सेक्सुअल अब्यूज़र होने पर भी उसका विरोध करने से रोकती है!

इसलिए आप अगर लव मैरिज करने जा रहे हैं, आर्थिक रूप से अपने पैरों पर खड़े हैं, कर लीजिये! माँ-बाप को मनाने की कोशिश करिए, मान गये तो ठीक और नहीं माने तो भी ठीक! शादी तो अपनी मर्ज़ी से ही करें! एक बात समझ लीजिये, माँ-बाप के प्रति आपके नैतिक दायित्व ज़रूर होते हैं लेकिन उनके द्वारा थोपे जाने वाले ग़लत बातों को मानना किसी नैतिकता में नहीं गिना जायेगा! इसलिए मत मानिए! दायित्व तो आपका समाज के प्रति भी है, आने वाली जनरेशन के प्रति भी है, सही होने का भी और ग़लत का विरोध करने का भी!

नोट: थोड़ा कड़वा लगेगा लेकिन सच भी यही है! बदलाव आ रहे हैं! बहुत से माँ-बाप बेहतरीन कर रहे हैं! लेकिन बहुसंख्या आज भी……

सोर्स- तारा शंकर PhD (JNU)

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